अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टेरिफ का असर अब तेज़ी से दिखने लगा है। खासकर अमेरिकी रिटेल दिग्गज Amazon, Walmart, Target और Gap जैसे कंपनियों ने भारत से आने वाले टेक्सटाइल और अपेरल ऑर्डर्स को रद्द करना या रोकना शुरू कर दिया है।
यह झटका भारत के लिए अप्रत्याशित नहीं था, लेकिन जिस तेजी से असर सामने आया है, उसने उद्योग जगत को चौंका दिया है।
ट्रंप प्रशासन ने पहले 25% और फिर अतिरिक्त 25% टेरिफ भारत पर थोप दिया, जिसकी वजह के तौर पर रूस से भारत के कच्चे तेल की खरीद को बताया गया। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह असली वजह नहीं है, क्योंकि चीन जैसे बड़े खरीदारों को इस समय टेरिफ से छूट मिली हुई है।
अमेरिका ने चीन को 90 दिन का “टैरिफ पॉज” दिया है, लेकिन भारत जैसे रणनीतिक साझेदार के साथ कड़ा रुख अपनाया गया है।
इस कदम से सबसे ज़्यादा नुकसान भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को हो रहा है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा टेक्सटाइल बाज़ार है, जहां कुल अपेरल और टेक्सटाइल एक्सपोर्ट का लगभग 40% जाता है।
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कई बड़ी भारतीय कंपनियां जैसे वेलस्पन लिविंग, गोकलदास एक्सपोर्ट्स और इंडोकाउंट अपनी 40-70% आय अमेरिकी बाजार से अर्जित करती हैं। अब टेरिफ के बढ़कर लगभग 60% होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी रिटेलर्स के लिए महंगे पड़ रहे हैं, जिससे वे बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
इस बदलाव का सीधा असर भारत के तमिलनाडु के त्रिपुर, यूपी के नोएडा और गुजरात के सूरत जैसे प्रमुख टेक्सटाइल हब पर हो रहा है। लाखों लोग जो डाइंग, स्टिचिंग और पैकिंग जैसे कार्यों में लगे थे, अब नौकरी खोने के खतरे में हैं।
इंडस्ट्री ग्रुप्स का अनुमान है कि एक्सपोर्ट लागत में 30-35% की वृद्धि होगी और अमेरिकी ऑर्डर्स में 50% तक गिरावट आ सकती है, जिससे अगले 12 महीनों में 4-5 बिलियन डॉलर का नुकसान संभव है।
कई अमेरिकी खरीदारों ने पहले ही भारत से ऑर्डर्स कम कर अन्य देशों में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान लंबे समय तक जारी रहा, तो यह स्थायी बदलाव बन सकता है। एक बार सप्लाई चेन बदल जाने के बाद उसे वापस पटरी पर लाना वर्षों का काम है।
आर्थिक मोर्चे पर यह केवल टेरिफ विवाद नहीं, बल्कि संभावित ट्रेड वॉर एस्केलेशन का संकेत है। भारत का अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी बढ़त खोना बड़े पैमाने पर रोजगार और आय पर असर डालेगा। वहीं अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी उत्पाद महंगे होंगे, क्योंकि बढ़ी हुई लागत अंततः उन्हीं को वहन करनी पड़ेगी।
राजनयिक स्तर पर भारत वैकल्पिक रणनीतियां बनाने में जुट गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स देशों सहित कई गैर-पश्चिमी व्यापारिक समूहों से संपर्क बढ़ाना शुरू कर दिया है। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला से हाल ही में बातचीत हुई, क्योंकि ब्राजील पर भी अमेरिका ने 50% टेरिफ लगाया है।
इसके अलावा, भारत रूस के साथ कई सेक्टरों में समझौते कर रहा है और यूरोप, यूएई तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने पर काम कर रहा है।
विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि भारत सरकार को घरेलू निर्माताओं को टैक्स रिबेट, सब्सिडी और ऑटोमेशन के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहें।
साथ ही, निर्यातकों को अपने बाजारों में विविधता लानी होगी और प्रीमियम उत्पादों पर ध्यान देना होगा, जहां कीमत की संवेदनशीलता कम होती है।
हालांकि अगस्त में भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड टॉक्स की उम्मीद थी, लेकिन ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि 50% टेरिफ विवाद सुलझने तक कोई वार्ता नहीं होगी। यह रुख आगे की स्थिति को और जटिल बना सकता है। अब सवाल यह है कि भारत इस आर्थिक और राजनयिक चुनौती से कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से निपट पाता है।
