USA के दबाव में नहीं झुका India – Russia से Big Deal पक्की

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ते टैरिफ दबाव के बीच भारत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी बाहरी प्रेशर में आकर अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।

इतिहास भी इसकी गवाही देता है – चाहे 1970 में इंदिरा गांधी का न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर हस्ताक्षर से इनकार हो या 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में न्यूक्लियर परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंधों का डटकर सामना, भारत ने हमेशा अपनी स्वतंत्र नीति पर कायम रहकर फैसले लिए हैं।

2025 में हालात कुछ उसी तरह के बन गए हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर दबाव बनाया कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे, अमेरिकी सामानों पर टैरिफ घटाए और कृषि एवं डेयरी सेक्टर को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले।

साथ ही भारत पर 50% तक के टैरिफ लगा दिए गए। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कह दिया कि कृषि और डेयरी सेक्टर की सुरक्षा भारत की “रेड लाइन” है और इसे किसी भी कीमत पर पार नहीं किया जाएगा।

इसके विपरीत, भारत ने रूस के साथ अपने संबंध और मजबूत करने का फैसला लिया। नई दिल्ली में हुए 11वें इंडिया-रूस वर्किंग ग्रुप ऑन मॉडर्नाइजेशन एंड इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन में दोनों देशों ने व्यापक एमओयू पर हस्ताक्षर किए।

इन समझौतों में इंडस्ट्रियल मॉडर्नाइजेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे आधुनिकीकरण, हाई-स्पीड रेल तकनीक, फर्टिलाइज़र सप्लाई, एलुमिनियम और रेयर अर्थ माइनिंग, कोयला गैसिफिकेशन, 3D प्रिंटिंग और वेस्ट मैनेजमेंट जैसे कई रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग शामिल है।

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रूस के लिए यह साझेदारी पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और चीन पर बढ़ती निर्भरता को संतुलित करने का मौका है। वहीं भारत के लिए यह अपने सप्लाई चेन को विविधतापूर्ण बनाने, क्रिटिकल मिनरल्स और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और “मेक इन इंडिया” को गति देने का अवसर है।

खासकर रूस से किफायती तेल की खरीद ने भारत को अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा बचाव करने और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद की है।

इस साझेदारी का संदेश केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह किसी भी वैश्विक शक्ति खेमे में अंधाधुंध शामिल नहीं होगा और अपनी नॉन-अलाइनमेंट एवं मल्टी-अलाइनमेंट नीति पर कायम रहेगा।

इससे अमेरिका की हेजेमनी को सीधी चुनौती मिलती है और ब्रिक्स व ग्लोबल साउथ जैसे प्लेटफॉर्मों पर भारत की भूमिका और मजबूत होती है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के जल्द भारत दौरे की घोषणा ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इस दौरान डिफेंस, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और व्यापार के नए समझौते होने की संभावना है।

वर्तमान में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 65 अरब डॉलर से अधिक है, जिसे 2030 तक दोगुना करने का लक्ष्य है।

निष्कर्ष साफ है – ट्रंप प्रशासन के दबाव के बावजूद भारत ने न केवल अपने रणनीतिक फैसलों में स्वतंत्रता बरकरार रखी, बल्कि रूस के साथ संबंधों को और गहरा किया। यह अमेरिका और ट्रंप के लिए एक मजबूत कूटनीतिक संदेश है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के लिए किसी भी स्थिति में खड़ा रहेगा।

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